रविवार, 26 जून 2011

मोबाइलोमीनिया

मैं और मेरा मोबाइल अक्सुर आपस में बातें करते थे । मैं उसे बताता था कि किस तरह दिल पर पत्थमर रखकर मैं उसे आठ हजार पाँच सौ निन्यानवे रुपये में खरीद कर लाया । फिर दो प्रतिशत 'अदर चार्जेज' का भुगतान भी किया क्योंकि 'क्रेडिट कार्ड' का प्रयोग जो किया था । फिर मैंने उसे पूर्ण सुरक्षा प्रदान करने के लिए, बारिश की बूँदों से बचाने के लिए, सूरज की झुलसा देने वाली गर्मी से दूर रखने के लिए, गैरों की मैली-कुचैली, मोटी-पतली, खुरदरी-मुलायम उंगलियों की बीमारी से बचाने के लिए उसे लेमिनेट करवाया । फिर उसे पूरा आराम (अभिषेक बच्चिन वाला बिंगो आराम नहीं) प्रदान करने के लिए उदर-पट्टिका (बेल्ट ) के साथ बांधा जाने वाला ब्रांडेड कंपनी का मोबाइल पर्स भी तीन सौ पचास रुपये में खरीदा । जब पहली बार मैंने उसे बांधा तब मेरे मन में अचानक यह परेशान कर देने वाला ख़्चयाल भी आने लगा कि पुराने जमाने में सेठ और लाला लोगों की लुगाइयाँ न जाने तिजोरी और हवेली की भारी-भारी चाबियां कैसे कमर पर बांधती होंगी, बल्कि मुझे उन पर दया आने लगी क्योंकि मेरे मोबाइल का वजन तो मात्र अस्सी चार चौरासी ग्राम ही था ।

मैं उसको बताता था कि मैं उससे बेइंतहा मोहब्बत करता हूँ, इसलिए जहां जाता उसे साथ ले जाता और अपनी दिनचर्या का महत्व पूर्ण हिस्सा् मैं उसे मानता था । अपने खड़ूस बॉस का काम 'डिले' करने को मैं हमेशा तैयार रहता था, मगर मेरे मोबाइल की रिंगटोन मुझे तीस सैकंड भी बर्दाश्ती नहीं होती थी । ऐसा नहीं था कि रिंगटोन में कोई री-मिक्स और बेहूदे गाने की धुन लगी हो या कोई पुराने जमाने की ट्रिन-ट्रिन सुनाई देती हो, बल्कि उसमें तो मैंने साईं बाबा का भजन लगा रखा था । यह देखने में आया कि भक्ति-रस और करुणा-रस की बयार में तो सभी बह जाते हैं और मैं नहीं चाहता था कि मेरे अतिरिक्त साईं बाबा किसी पर दया बरसाएं, वैसे राधे-राधे, हरि ओम, ॐभुर्भव स्व:, अपनी संतोषी माँ, जयकारा शेरा वाली दा जैसी रिंगटोन्स के विकल्पे मेरे सामने थे लेकिन जमाने के साथ चलने में ही समझदारी दिखाते हुए मैंने साईं बाबा का भजन गुनगुनाने की ठान ली थी । जैसे ही साईं बाबा के भजन में मेरे अड़ोस-पड़ोस के लोग खोने लगते, मैं फौरन एक बटन दबाकर प्यार से उसे गालों पर सटा कर होले से बोल उठता, 'हैलो!' और बातों का सिलसिला देर तक जारी रखता । देखिए, यदि फोन जल्दी से काट दिया जाए तो दो खतरे थे कि एक तो अड़ोसी-पड़ोसी साईं बाबा का भजन गुनगुनाने लगते थे और दूसरे, फोन करने वाले को बुरा न लगे कि मेरा फोन ढंग से अटैंड ही नहीं किया । साथ ही एक डायलॉग मुझे बहुत बुरा लगता है जब कोई फोन पर यह कहता है कि 'अभी मैं जल्दी में हूँ, तुम बाद में मिस कॉल मार देना' । अरे भाई, मिस कॉल भी कोई मारने की चीज होती है, मारना ही है तो कोई शेर मारो, नहीं हिम्मत है तो मक्खी मारो या फिर मेरी तरह झक ही मारो लेकिन मिस कॉल को मारने की बात क्यों करते हो ? मेरे पुराने ऑफिस में मिसेज कॉल हुआ करती थी, सचमुच उन्हें देखकर सुबह-सुबह तबीयत खिल जाती थी, गुलाबी गालों के बीच लाल सुर्ख होठों से जब वह मेरा नाम लेकर 'गुड मार्निंग' बोलती थी तब मेरा सुबह का आधा-अधूरा नाश्तां पूरा हो जाता था और फिर दिन भर एनर्जी बनी रहती थी, भला मैं कैसे बर्दाश्त करूँ कि कोई मिस कॉल को मारने की बात करे । यह कश्मीरी बालाएं तो वैसे भी बहुत नाजुक होती हैं । हाँ, जब कोई मुझसे फोन पर ऊँची आवाज में बात करता तो मैं शीघ्रता से लाल बटन दबा देता, मुझे लगता रावण महाराज सीता मय्या की कुटिया पर भिक्षा माँगने आ गए हैं । बाद में जब कभी वो शिकायत करता तो मैं टावर-फेल हो जाने की बात कह देता था ।

मैं उसे बताया करता था कि वैसे तो तुम्हें बाजार से मैं खरीदना नहीं चाहता था, मैं सोचता था कि शायद मुझे कोई गिफ्ट मिल जाए । लेकिन मुझे मेरी औकात मालूम थी, बल्कि कुछ ज्यादा ही अच्छी तरह से मालूम थी । मैं कोई अव्वहल दर्जे का खिलाड़ी तो था नहीं, जो शतक-दर-शतक बनाता हो और जिसे फरारी, बीएमडब्‍ल्‍यू जैसी लंबी गाड़ी मुफ़्त में मिल जाती है । मैं कोई खली भी नहीं था जो पहले विदेश में जाकर पैसा कमाता और देश में आकर कायदे-कानून की धज्जियां उड़ाता था । मेरा कोई शाहरुख खान जैसा दोस्त भी तो नहीं जो अपने एक गाने में दस मिनट की शूटिंग के लिए महंगा मोबाइल उपहार-स्वरूप भेंट कर देता । मैं कोई नेता भी नहीं जो घोटाले पर घोटाले करता जाए, आयकर कानून को ताक पर रख दे और फ्लैट तो फ्लैट, फार्म हाउस भी डकार जाए और साथ ही कहे कि आपके पास क्या सबूत है ? मैं तो अदना सा बैंक-कर्मचारी हूँ, जो तनख्वाह बढ़ाने के लिए हड़ताल करता है और अपनी तनख्वाबह कटवाता भी है, जो बच्चे की स्कू्ल-फीस कम करवाने के लिए भूख-हड़ताल में भाग लेकर सहानुभूति बटोरता है, जो बड़ी शान से अपनी कविता-कहानी छपने पर मिलने वाले आय को भी आय-कर के लिए जोड़ता है और कर्ज लेकर उस कथन को भी सार्थक करता है कि बैंक कर्मचारी कर्ज में जीता है और कर्ज में ही मर जाता है ।

मरता क्या न करता, मैं अपनी बीवी से डरने वाले पतियों में से एक, उसकी इच्छा-पूर्ति के लिए तुझे खरीद लाया । बात यह नहीं थी कि मुझे गैजेट्स का शौंक नहीं या फिर किसी नई तकनीक का इस्तेमाल करने से मैं घबरा जाता हूँ, बात कुछ और थी । दरअसल ले-देकर वही तो एक थी जिससे पहले तेईस ने मुझे 'रिजेक्ट' कर दिया था । मेरी मां ने पहले तो 'हैल्दी, वैल्दी और वाइज' बहू पाने के लिए न जाने कितने व्रत रखे, लेकिन ज्यों-ज्यों उनकी आंखों के चश्मे का नंबर टी वी देखते-देखते बढ़ता गया, उन्होंछ 'करिश्मा' जैसी बहू पाने का सपना देखना ही छोड़ दिया था । वो तो हमारे हिंदी के मास्टर जी का ही कारनामा था जो हमारे मामा के पड़ोस में रहते थे और कभी-कभी हमारी छपने वाली कविता पढ़ते-पढ़ते अपनी रचना को हमारे पल्ले बांध दिया था । अब कोई कवि-हृदय यदि किसी नारी में कमियां ढूंढे तो भला उसे कवि कौन कहेगा ?

हमारे गुड्डे-गुड्डी की अम्मा ने हमसे एक दिन साफ-साफ कह दिया कि या तो समय पर घर पहुंच जाएं वरना खाना बनाना और खिलाना नहीं होगा । अब उसे कौन समझाए कि बैंकों में कंप्यूटर तो लग गए हैं, लेकिन सभी लोगों को कंप्यूटर चलाना नहीं आता और ऐसे में कोई बड़ा-बुजुर्ग हमसे कह दे कि जरा मेरा भी काम निपटवा दो तो भला हम उसको कैसे मना कर दें, फिर तो वही बात हो जाती कि हम अपनी इंसानियत खो बैठते । फिर सड़क पर दुपहिया हो या चार हाथों वाली कार, हिंदुस्तांन में अभी 'ट्रेफिक सेंस' नहीं आया है । बहुत सी झंझट भरी बातों का हम 'पोस्टमार्टम' करते रहे लेकिन 'व्हाट एन आइडिया सर जी' तो हमारी मैडम ने ही दिया । उनकी उस दिन जैसी मीठी जुबान हमने आज तक नहीं सुनी थी । अपनी सोलह साल पहले की आवाज में उन्होंने हमें यह सलाह दी कि एक मोबाइल खरीद लें, ताकि यह जानकारी मिल सके कि आप कहीं रास्ता तो नहीं भटक गए हैं और आप कितनी देर बाद घर में पदार्पण करेंगे । हमारे सुलगते हुए मन में बार-बार यह ज्वार उठता रहा कि पूछ लें, 'हमें क्या बच्चा समझ रखा है जो रास्ता भटक जाएंगे', लेकिन हमारी छठी इंद्री अचानक जाग गई और हम समझ गए कि यह किस भटकन की बात कर रही है ।

यह तो हमारी नेक-चलनी और हमसे टूटी-फ्रूटी आईसक्रीम खाने के बहाने टूटी-फूटी कविता सुनने वाली महिला-मित्रों के हितों पर कुठाराघात था । हमारी कविता की 'मार्केटिंग' तो यही महिला-मित्र किया करती थीं और हमारी कविताओं को संपादकों तक डाक से भेजने का कार्य भी तो करती थीं । हमें तो गहरा सदमा लग गया । बाकी सब-कुछ ठीक न हो तो कोई बात नहीं, जैसे सड़क पर गड्ढों पर ढक्कन न लगे हों तो कोई बात नहीं, दूध में पानी मिलाए बिना दूध नहीं बिकता तो कोई बात नहीं, रचना छपने के लिए भेजी जाए और संपादक महोदय उस पर गर्म समोसा रखकर खा जाएं तो कोई बात नहीं, महंगाई कम हो जाएगी जैसी बात आप बार-बार सुन रहे हैं और महंगाई है कि महंगी होती जा रही है तो कोई बात नहीं, अगले साल घर के आगे सड़क बन जाएगी सुनते-सुनते आपने अपनी कार पर हजारों रूपए की रकम खर्च कर दी हो तो कोई बात नहीं, लेकिन यदि बात शक की है तब जरूर कोई बात है । लेकिन ऐसी कोई बात थी भी नहीं, वो बात अलग थी कि हम अपनी महिला-मित्रों के किस्से अपनी नटखट शैली में बेगम साहिबा को सुनाते रहते थे । वैसे भी इस बीमारी का इलाज मोहल्ले के झोली-झंडों वाले हकीमों को तो छोड़ दीजिए, राजा-महाराजा के वैद्यजनों के पास भी नहीं मिलेगा । अब बीमारी तो लग ही गई थी । हमने भी चुपचाप मोबाइल खरीद लिया और उनका जीवन सुखमय बनाने की कोशिश करने लगे, यह सोचकर कि अपनी तो जैसे-तैसे, थोड़ी ऐसे या वैसे कट जाएगी ।

मोबाइल मियां के लिए तो वह खुशियों भरा दिन था और वह उस दिन उतने ही खुश थे जैसे सैफ अली खां पद्मश्री पाकर अपने आपको गौरवान्वित महसूस कर रहे थे । जब पहली बार मैंने चमकते-दमकते मोबाइल मियां को अपनी पत्नी की बरतन घिस-घिस कर खुरदरी हो रही हथेलियों पर रखा था तब उसने उसे आगे-पीछे बुरी तरह से चूमना शुरू कर दिया था जैसे उसे 'इश्किया' की विद्या बालन वाला रोग लग गया हो । अब मुझे इस बात का गम नहीं था कि वो मुझ पर शक करती थी, दुख इस बात का ज्यादा था कि अब हमारी बेगम शाम के समय मेरा नहीं, अपने मोबाइल का इंतजार करती थी । मुझे एक-एक कॉल का हिसाब उसे देना पड़ता था, मुझसे कहा जाता था कि इस फोन पर मेरे या मेरे मायके वालों के फोन ही आने चाहिए । मैसेज-बॉक्स में वो मेरे मैसेज भी पढ़ डालती थी । शायद उसके साहित्यानुरागी पिता ने यह बात नहीं सिखाई होगी कि किसी की चिट्ठी पढ़ना भी एक अपराध होता है । 'वेज' और 'नॉन-वेज' मैसेज भी वो एक ही स्‍वर में पढ़ा करती और फिर पूछ भी डालती, यह मैसेज किसने भेजा है, क्यां तुम्हारे सारे दोस्त ऐसे ही हैं, मैं एकदम चुप्पी लगा जाता । अब उसे कौन समझाए कि यह मैसेज जीजा-साली में चलते हैं । कुछ शायरी वाले मैसेज भी होते थे जो फारवर्ड होकर आ जाते थे । री-मिक्सम गानों के बाद शायरी की मौलिकता पर भी वीडियो पाइरेसी जैसा खतरा मंडराने लगा है । इस मैसेज बॉक्स के आधार पर ही वो मुझे उलाहना दे डालती कि बाजार में आपको इतने ऑफर मिल रहे हैं, अस्सी प्रतिशत छूट मिल रही है, आखिर सस्ता सामान क्यों नहीं खरीद लाते, जब देखो महंगे ब्रांड का सामान ही घर में लाते हो । जवाब में मैं बस इतना ही कह देता था कि सस्ता रोता बार-बार महंगा एक बार ।

अब वो मोबाइल मेरे पास नहीं है । क्यों नहीं है, इसका तो एक ही जवाब है और वो यह कि अब वो मोबाइल मेरे गुड्डे-गुड्डी की अम्मा के पास है । हुआ यूं कि एक बार वो पीहर गई तो साथ ही मोबाइल भी लेती गई और फिर वह मोबाइल पर आसक्त हो गई, आखिर चौबीस घंटे उसे अपने इशारों पर नचाया जा सकता था । सब-कुछ मुझसे सीख ही लिया था, जो नहीं आता था वो बारह साल के गुड्डू से सीख लिया । अब घर पर मेरा इंतजार नहीं होता था और ना ही मुझसे देर से आने का कारण पूछा जाता था । अब तो मोबाइल मियां हर वक्त उनके हाथ में मटकते रहते थे, उनके स्त्री-धन के रूप में मोबाइल ने भी अपना नाम लिखवा लिया था । न जाने कैसे-कैसे गुल खिलाने में लगे रहते हैं दोनों । मेरी तो एक कमाई अब घरेलू खर्चों के लिए कम पड़ने लगी है, सोचता हूँ कि शेयर-ट्रेडिंग करना शुरू कर दूँ ।

मोबाइल के न होने से मेरी क्रिएटिविटी पर विपरीत प्रभाव पड़ा है, अब मुझे शेर-ओ-शायरी सूझती भी है तो कुछ समय बाद उसे भूल जाता हूँ । एस एम एस से प्यार करते-करते मेरी हैंड-राइटिंग भी बिगड़ गई है और अब तो पैन से लिखना अच्छा भी नहीं लगता । अपने मित्रों की नजरों में अब मैं लो-टैक हो गया हूँ । मुझसे खुलकर तो कोई नहीं कहता लेकिन, इशारों-इशारों में मैं समझ जाता हूँ कि अब मेरा स्टैंडर्ड भी लो हो गया है । मुझमें पहले वाली शक्ति और जागरूकता नहीं रही, मैं जलती-बुझती ट्यूबलाईट हो गया हूँ जबकि आजकल जमाना 'फ्लोरोसेंट' का आ गया है ।

जब मैं गहराई से सोचता हूँ तो अच्छा भी लगता है कि अब पहले से ज्यादा सुख-शांति है क्योंकि न तो कार्यस्थल से और न ही रिश्तेदारों के औपचारिकता से भरे फोन आते हैं और न ही कभी इन्वेस्टमेंट के, न प्रोडक्ट खरीदने के और न ही वैल्यू-एडेड सुविधाओं को लेने के लिए उकसाने वाली छप्पन-छुरियों से बातचीत होती है । आखिर हमारे देश की आबादी के आधे से ज्यादा लोगों के पास सिर छिपाने की जगह नहीं है । कितने ही बच्चों के पास स्कूल की किताबें खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं । कितने ही घरों में अभी तक पीने का पानी भी पर्याप्त् मात्रा में नहीं मिलता । कितनी ही बीमारियों के बारे में लोगों को समझाना बाकी है । अभी भी भुखमरी और बाल-मजदूरी के शिकार बच्चों के कल्यांण के लिए योजनाओं की कमी है । जब इतना सब-कुछ नहीं है तब इस बारे में वास्तव में सोचना आवश्यसक है । यह तो वैसे भी एक मोबाइल है, न जाने किस क्षण कौन सा 'फीचर' पुराना हो जाता है और न जाने कौन सी कंपनी किस वक्त कौन सा 'टैरिफ प्लान' पेश कर देती है । मोबाइल ने बहुत से लोगों को अपना गुलाम भी तो बना लिया है । जरा सोचकर देखिए कि आप कहीं मोबाइलोमीनिया के शिकार तो नहीं । ख़ुदा खैर करे ।

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