मैं और मेरा मोबाइल अक्सुर आपस में बातें करते थे । मैं उसे बताता था कि किस तरह दिल पर पत्थमर रखकर मैं उसे आठ हजार पाँच सौ निन्यानवे रुपये में खरीद कर लाया । फिर दो प्रतिशत 'अदर चार्जेज' का भुगतान भी किया क्योंकि 'क्रेडिट कार्ड' का प्रयोग जो किया था । फिर मैंने उसे पूर्ण सुरक्षा प्रदान करने के लिए, बारिश की बूँदों से बचाने के लिए, सूरज की झुलसा देने वाली गर्मी से दूर रखने के लिए, गैरों की मैली-कुचैली, मोटी-पतली, खुरदरी-मुलायम उंगलियों की बीमारी से बचाने के लिए उसे लेमिनेट करवाया । फिर उसे पूरा आराम (अभिषेक बच्चिन वाला बिंगो आराम नहीं) प्रदान करने के लिए उदर-पट्टिका (बेल्ट ) के साथ बांधा जाने वाला ब्रांडेड कंपनी का मोबाइल पर्स भी तीन सौ पचास रुपये में खरीदा । जब पहली बार मैंने उसे बांधा तब मेरे मन में अचानक यह परेशान कर देने वाला ख़्चयाल भी आने लगा कि पुराने जमाने में सेठ और लाला लोगों की लुगाइयाँ न जाने तिजोरी और हवेली की भारी-भारी चाबियां कैसे कमर पर बांधती होंगी, बल्कि मुझे उन पर दया आने लगी क्योंकि मेरे मोबाइल का वजन तो मात्र अस्सी चार चौरासी ग्राम ही था ।
मैं उसको बताता था कि मैं उससे बेइंतहा मोहब्बत करता हूँ, इसलिए जहां जाता उसे साथ ले जाता और अपनी दिनचर्या का महत्व पूर्ण हिस्सा् मैं उसे मानता था । अपने खड़ूस बॉस का काम 'डिले' करने को मैं हमेशा तैयार रहता था, मगर मेरे मोबाइल की रिंगटोन मुझे तीस सैकंड भी बर्दाश्ती नहीं होती थी । ऐसा नहीं था कि रिंगटोन में कोई री-मिक्स और बेहूदे गाने की धुन लगी हो या कोई पुराने जमाने की ट्रिन-ट्रिन सुनाई देती हो, बल्कि उसमें तो मैंने साईं बाबा का भजन लगा रखा था । यह देखने में आया कि भक्ति-रस और करुणा-रस की बयार में तो सभी बह जाते हैं और मैं नहीं चाहता था कि मेरे अतिरिक्त साईं बाबा किसी पर दया बरसाएं, वैसे राधे-राधे, हरि ओम, ॐभुर्भव स्व:, अपनी संतोषी माँ, जयकारा शेरा वाली दा जैसी रिंगटोन्स के विकल्पे मेरे सामने थे लेकिन जमाने के साथ चलने में ही समझदारी दिखाते हुए मैंने साईं बाबा का भजन गुनगुनाने की ठान ली थी । जैसे ही साईं बाबा के भजन में मेरे अड़ोस-पड़ोस के लोग खोने लगते, मैं फौरन एक बटन दबाकर प्यार से उसे गालों पर सटा कर होले से बोल उठता, 'हैलो!' और बातों का सिलसिला देर तक जारी रखता । देखिए, यदि फोन जल्दी से काट दिया जाए तो दो खतरे थे कि एक तो अड़ोसी-पड़ोसी साईं बाबा का भजन गुनगुनाने लगते थे और दूसरे, फोन करने वाले को बुरा न लगे कि मेरा फोन ढंग से अटैंड ही नहीं किया । साथ ही एक डायलॉग मुझे बहुत बुरा लगता है जब कोई फोन पर यह कहता है कि 'अभी मैं जल्दी में हूँ, तुम बाद में मिस कॉल मार देना' । अरे भाई, मिस कॉल भी कोई मारने की चीज होती है, मारना ही है तो कोई शेर मारो, नहीं हिम्मत है तो मक्खी मारो या फिर मेरी तरह झक ही मारो लेकिन मिस कॉल को मारने की बात क्यों करते हो ? मेरे पुराने ऑफिस में मिसेज कॉल हुआ करती थी, सचमुच उन्हें देखकर सुबह-सुबह तबीयत खिल जाती थी, गुलाबी गालों के बीच लाल सुर्ख होठों से जब वह मेरा नाम लेकर 'गुड मार्निंग' बोलती थी तब मेरा सुबह का आधा-अधूरा नाश्तां पूरा हो जाता था और फिर दिन भर एनर्जी बनी रहती थी, भला मैं कैसे बर्दाश्त करूँ कि कोई मिस कॉल को मारने की बात करे । यह कश्मीरी बालाएं तो वैसे भी बहुत नाजुक होती हैं । हाँ, जब कोई मुझसे फोन पर ऊँची आवाज में बात करता तो मैं शीघ्रता से लाल बटन दबा देता, मुझे लगता रावण महाराज सीता मय्या की कुटिया पर भिक्षा माँगने आ गए हैं । बाद में जब कभी वो शिकायत करता तो मैं टावर-फेल हो जाने की बात कह देता था ।
मैं उसे बताया करता था कि वैसे तो तुम्हें बाजार से मैं खरीदना नहीं चाहता था, मैं सोचता था कि शायद मुझे कोई गिफ्ट मिल जाए । लेकिन मुझे मेरी औकात मालूम थी, बल्कि कुछ ज्यादा ही अच्छी तरह से मालूम थी । मैं कोई अव्वहल दर्जे का खिलाड़ी तो था नहीं, जो शतक-दर-शतक बनाता हो और जिसे फरारी, बीएमडब्ल्यू जैसी लंबी गाड़ी मुफ़्त में मिल जाती है । मैं कोई खली भी नहीं था जो पहले विदेश में जाकर पैसा कमाता और देश में आकर कायदे-कानून की धज्जियां उड़ाता था । मेरा कोई शाहरुख खान जैसा दोस्त भी तो नहीं जो अपने एक गाने में दस मिनट की शूटिंग के लिए महंगा मोबाइल उपहार-स्वरूप भेंट कर देता । मैं कोई नेता भी नहीं जो घोटाले पर घोटाले करता जाए, आयकर कानून को ताक पर रख दे और फ्लैट तो फ्लैट, फार्म हाउस भी डकार जाए और साथ ही कहे कि आपके पास क्या सबूत है ? मैं तो अदना सा बैंक-कर्मचारी हूँ, जो तनख्वाह बढ़ाने के लिए हड़ताल करता है और अपनी तनख्वाबह कटवाता भी है, जो बच्चे की स्कू्ल-फीस कम करवाने के लिए भूख-हड़ताल में भाग लेकर सहानुभूति बटोरता है, जो बड़ी शान से अपनी कविता-कहानी छपने पर मिलने वाले आय को भी आय-कर के लिए जोड़ता है और कर्ज लेकर उस कथन को भी सार्थक करता है कि बैंक कर्मचारी कर्ज में जीता है और कर्ज में ही मर जाता है ।
मरता क्या न करता, मैं अपनी बीवी से डरने वाले पतियों में से एक, उसकी इच्छा-पूर्ति के लिए तुझे खरीद लाया । बात यह नहीं थी कि मुझे गैजेट्स का शौंक नहीं या फिर किसी नई तकनीक का इस्तेमाल करने से मैं घबरा जाता हूँ, बात कुछ और थी । दरअसल ले-देकर वही तो एक थी जिससे पहले तेईस ने मुझे 'रिजेक्ट' कर दिया था । मेरी मां ने पहले तो 'हैल्दी, वैल्दी और वाइज' बहू पाने के लिए न जाने कितने व्रत रखे, लेकिन ज्यों-ज्यों उनकी आंखों के चश्मे का नंबर टी वी देखते-देखते बढ़ता गया, उन्होंछ 'करिश्मा' जैसी बहू पाने का सपना देखना ही छोड़ दिया था । वो तो हमारे हिंदी के मास्टर जी का ही कारनामा था जो हमारे मामा के पड़ोस में रहते थे और कभी-कभी हमारी छपने वाली कविता पढ़ते-पढ़ते अपनी रचना को हमारे पल्ले बांध दिया था । अब कोई कवि-हृदय यदि किसी नारी में कमियां ढूंढे तो भला उसे कवि कौन कहेगा ?
हमारे गुड्डे-गुड्डी की अम्मा ने हमसे एक दिन साफ-साफ कह दिया कि या तो समय पर घर पहुंच जाएं वरना खाना बनाना और खिलाना नहीं होगा । अब उसे कौन समझाए कि बैंकों में कंप्यूटर तो लग गए हैं, लेकिन सभी लोगों को कंप्यूटर चलाना नहीं आता और ऐसे में कोई बड़ा-बुजुर्ग हमसे कह दे कि जरा मेरा भी काम निपटवा दो तो भला हम उसको कैसे मना कर दें, फिर तो वही बात हो जाती कि हम अपनी इंसानियत खो बैठते । फिर सड़क पर दुपहिया हो या चार हाथों वाली कार, हिंदुस्तांन में अभी 'ट्रेफिक सेंस' नहीं आया है । बहुत सी झंझट भरी बातों का हम 'पोस्टमार्टम' करते रहे लेकिन 'व्हाट एन आइडिया सर जी' तो हमारी मैडम ने ही दिया । उनकी उस दिन जैसी मीठी जुबान हमने आज तक नहीं सुनी थी । अपनी सोलह साल पहले की आवाज में उन्होंने हमें यह सलाह दी कि एक मोबाइल खरीद लें, ताकि यह जानकारी मिल सके कि आप कहीं रास्ता तो नहीं भटक गए हैं और आप कितनी देर बाद घर में पदार्पण करेंगे । हमारे सुलगते हुए मन में बार-बार यह ज्वार उठता रहा कि पूछ लें, 'हमें क्या बच्चा समझ रखा है जो रास्ता भटक जाएंगे', लेकिन हमारी छठी इंद्री अचानक जाग गई और हम समझ गए कि यह किस भटकन की बात कर रही है ।
यह तो हमारी नेक-चलनी और हमसे टूटी-फ्रूटी आईसक्रीम खाने के बहाने टूटी-फूटी कविता सुनने वाली महिला-मित्रों के हितों पर कुठाराघात था । हमारी कविता की 'मार्केटिंग' तो यही महिला-मित्र किया करती थीं और हमारी कविताओं को संपादकों तक डाक से भेजने का कार्य भी तो करती थीं । हमें तो गहरा सदमा लग गया । बाकी सब-कुछ ठीक न हो तो कोई बात नहीं, जैसे सड़क पर गड्ढों पर ढक्कन न लगे हों तो कोई बात नहीं, दूध में पानी मिलाए बिना दूध नहीं बिकता तो कोई बात नहीं, रचना छपने के लिए भेजी जाए और संपादक महोदय उस पर गर्म समोसा रखकर खा जाएं तो कोई बात नहीं, महंगाई कम हो जाएगी जैसी बात आप बार-बार सुन रहे हैं और महंगाई है कि महंगी होती जा रही है तो कोई बात नहीं, अगले साल घर के आगे सड़क बन जाएगी सुनते-सुनते आपने अपनी कार पर हजारों रूपए की रकम खर्च कर दी हो तो कोई बात नहीं, लेकिन यदि बात शक की है तब जरूर कोई बात है । लेकिन ऐसी कोई बात थी भी नहीं, वो बात अलग थी कि हम अपनी महिला-मित्रों के किस्से अपनी नटखट शैली में बेगम साहिबा को सुनाते रहते थे । वैसे भी इस बीमारी का इलाज मोहल्ले के झोली-झंडों वाले हकीमों को तो छोड़ दीजिए, राजा-महाराजा के वैद्यजनों के पास भी नहीं मिलेगा । अब बीमारी तो लग ही गई थी । हमने भी चुपचाप मोबाइल खरीद लिया और उनका जीवन सुखमय बनाने की कोशिश करने लगे, यह सोचकर कि अपनी तो जैसे-तैसे, थोड़ी ऐसे या वैसे कट जाएगी ।
मोबाइल मियां के लिए तो वह खुशियों भरा दिन था और वह उस दिन उतने ही खुश थे जैसे सैफ अली खां पद्मश्री पाकर अपने आपको गौरवान्वित महसूस कर रहे थे । जब पहली बार मैंने चमकते-दमकते मोबाइल मियां को अपनी पत्नी की बरतन घिस-घिस कर खुरदरी हो रही हथेलियों पर रखा था तब उसने उसे आगे-पीछे बुरी तरह से चूमना शुरू कर दिया था जैसे उसे 'इश्किया' की विद्या बालन वाला रोग लग गया हो । अब मुझे इस बात का गम नहीं था कि वो मुझ पर शक करती थी, दुख इस बात का ज्यादा था कि अब हमारी बेगम शाम के समय मेरा नहीं, अपने मोबाइल का इंतजार करती थी । मुझे एक-एक कॉल का हिसाब उसे देना पड़ता था, मुझसे कहा जाता था कि इस फोन पर मेरे या मेरे मायके वालों के फोन ही आने चाहिए । मैसेज-बॉक्स में वो मेरे मैसेज भी पढ़ डालती थी । शायद उसके साहित्यानुरागी पिता ने यह बात नहीं सिखाई होगी कि किसी की चिट्ठी पढ़ना भी एक अपराध होता है । 'वेज' और 'नॉन-वेज' मैसेज भी वो एक ही स्वर में पढ़ा करती और फिर पूछ भी डालती, यह मैसेज किसने भेजा है, क्यां तुम्हारे सारे दोस्त ऐसे ही हैं, मैं एकदम चुप्पी लगा जाता । अब उसे कौन समझाए कि यह मैसेज जीजा-साली में चलते हैं । कुछ शायरी वाले मैसेज भी होते थे जो फारवर्ड होकर आ जाते थे । री-मिक्सम गानों के बाद शायरी की मौलिकता पर भी वीडियो पाइरेसी जैसा खतरा मंडराने लगा है । इस मैसेज बॉक्स के आधार पर ही वो मुझे उलाहना दे डालती कि बाजार में आपको इतने ऑफर मिल रहे हैं, अस्सी प्रतिशत छूट मिल रही है, आखिर सस्ता सामान क्यों नहीं खरीद लाते, जब देखो महंगे ब्रांड का सामान ही घर में लाते हो । जवाब में मैं बस इतना ही कह देता था कि सस्ता रोता बार-बार महंगा एक बार ।
अब वो मोबाइल मेरे पास नहीं है । क्यों नहीं है, इसका तो एक ही जवाब है और वो यह कि अब वो मोबाइल मेरे गुड्डे-गुड्डी की अम्मा के पास है । हुआ यूं कि एक बार वो पीहर गई तो साथ ही मोबाइल भी लेती गई और फिर वह मोबाइल पर आसक्त हो गई, आखिर चौबीस घंटे उसे अपने इशारों पर नचाया जा सकता था । सब-कुछ मुझसे सीख ही लिया था, जो नहीं आता था वो बारह साल के गुड्डू से सीख लिया । अब घर पर मेरा इंतजार नहीं होता था और ना ही मुझसे देर से आने का कारण पूछा जाता था । अब तो मोबाइल मियां हर वक्त उनके हाथ में मटकते रहते थे, उनके स्त्री-धन के रूप में मोबाइल ने भी अपना नाम लिखवा लिया था । न जाने कैसे-कैसे गुल खिलाने में लगे रहते हैं दोनों । मेरी तो एक कमाई अब घरेलू खर्चों के लिए कम पड़ने लगी है, सोचता हूँ कि शेयर-ट्रेडिंग करना शुरू कर दूँ ।
मोबाइल के न होने से मेरी क्रिएटिविटी पर विपरीत प्रभाव पड़ा है, अब मुझे शेर-ओ-शायरी सूझती भी है तो कुछ समय बाद उसे भूल जाता हूँ । एस एम एस से प्यार करते-करते मेरी हैंड-राइटिंग भी बिगड़ गई है और अब तो पैन से लिखना अच्छा भी नहीं लगता । अपने मित्रों की नजरों में अब मैं लो-टैक हो गया हूँ । मुझसे खुलकर तो कोई नहीं कहता लेकिन, इशारों-इशारों में मैं समझ जाता हूँ कि अब मेरा स्टैंडर्ड भी लो हो गया है । मुझमें पहले वाली शक्ति और जागरूकता नहीं रही, मैं जलती-बुझती ट्यूबलाईट हो गया हूँ जबकि आजकल जमाना 'फ्लोरोसेंट' का आ गया है ।
जब मैं गहराई से सोचता हूँ तो अच्छा भी लगता है कि अब पहले से ज्यादा सुख-शांति है क्योंकि न तो कार्यस्थल से और न ही रिश्तेदारों के औपचारिकता से भरे फोन आते हैं और न ही कभी इन्वेस्टमेंट के, न प्रोडक्ट खरीदने के और न ही वैल्यू-एडेड सुविधाओं को लेने के लिए उकसाने वाली छप्पन-छुरियों से बातचीत होती है । आखिर हमारे देश की आबादी के आधे से ज्यादा लोगों के पास सिर छिपाने की जगह नहीं है । कितने ही बच्चों के पास स्कूल की किताबें खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं । कितने ही घरों में अभी तक पीने का पानी भी पर्याप्त् मात्रा में नहीं मिलता । कितनी ही बीमारियों के बारे में लोगों को समझाना बाकी है । अभी भी भुखमरी और बाल-मजदूरी के शिकार बच्चों के कल्यांण के लिए योजनाओं की कमी है । जब इतना सब-कुछ नहीं है तब इस बारे में वास्तव में सोचना आवश्यसक है । यह तो वैसे भी एक मोबाइल है, न जाने किस क्षण कौन सा 'फीचर' पुराना हो जाता है और न जाने कौन सी कंपनी किस वक्त कौन सा 'टैरिफ प्लान' पेश कर देती है । मोबाइल ने बहुत से लोगों को अपना गुलाम भी तो बना लिया है । जरा सोचकर देखिए कि आप कहीं मोबाइलोमीनिया के शिकार तो नहीं । ख़ुदा खैर करे ।
रविवार, 26 जून 2011
शनिवार, 18 जून 2011
मोहे दीजो वरदान
अभी सूरज की पहली किरण ने पृथ्वीद से आंखें नहीं मिलाई थी क्योंकि अभी मुर्गे ने बांग नहीं दी थी । अब मुर्गे ने बांग नहीं दी तो उसकी इच्छा नहीं हुई होगी । शायद सो रहा होगा । मेरी नासिका से भी तो घड़ी के अलार्म की तरह घर्र-घर्र की आवाज आने लगी थी और शायद इसीलिए श्रीमती जी मेरा नाक दबाते हुए बोली, ‘दिन में दफ़्तर में थोड़ा सो जाया करिए, नाहक ही आधी रात को परेशान करते हो, अपनी नहीं तो दूसरों की सेहत का ख़्याल तो किया कीजिए ।‘ अब मैं लगभग उठकर बैठ ही गया, कहना तो बहुत कुछ चाहता था लेकिन, घर के अन्य सदस्यों की नींद खराब होने के डर से चुप ही रहा । हां, अंधेरे में मेरी भाव-भंगिमाएं देख कर कोई भी अनुमान लगा सकता था कि मैं इस समय कितनी गहरी निद्रा में से बाहर आने की कोशिश कर रहा था । अभी भी निद्रादेवी मेरे कमलनयनों से प्रेमालाप करना चाहती थी ।
यह नींद भी अजीब बीमारी है, किसी को आती नहीं है तो किसी को बहुत आती है । अक्स़र सोचता हूं कि श्रीनारायण अगर सामने आएं तो मैं उनसे यह वरदान मांग लूं कि मेरी आंखों से नींद उड़ा दो, दीवार जो हम दोनों में है आज गिरा दो, जिस तरह कुंभकरण को सोते रहने का वरदान दिया था, उसी तरह मुझे जागते रहने का वरदान दे दो । लेकिन वो शायद कुछ अधिक समझदार हैं, मेरी बात पहले से ही सुन लेते हैं और संभल जाते हैं, इसी कारण तो वो मेरे सामने कभी आते नहीं है । मुझे ऐसा लगता है कि वो भी लकीर के फ़कीर बने रहना चाहते हैं और कोई नया काम करने को तैयार नहीं है या यूं कहें कि भगवान भी सोया रहना चाहता है ।
वैसे भी हमारे देश में सोने का प्रचलन कुछ ज्यादा ही है । मौसम विभाग सोया हुआ रहता है, जिस दिन कहता है कि बारिश आएगी, तेज गर्मी पड़ती है, जिस दिन लू चलने की बात करता है कि कहीं से कोई बदली आकर बरस जाती है । बागों के माली सोये हुए रहते हैं, इसलिए वहां पर क्यारियों में कूड़े के ढेर मिलते हैं, गंदगी के साम्राज्य को देखते हुए फूलों की खुशबू तो वहां से कपूर की तरह काफ़ूर हो गई है । रेलवे स्टेढशन पर सवारियां गाड़ी की प्रतीक्षा में ऊंघती रहती हैं और गाड़ी आ जाने पर उसके अंदर सोने के लिए जगह ढूंढती रहती हैं । अपनी बर्थ पक्कीऔ करने के लिए न जाने कितने दिन पहले टिकट लेनी पड़ती है, नहीं मिलती तो एजेंट हैं ना । सड़को के बीच में गाय रंभाती रहती हैं, कुत्ते सोये रहते हैं और उन्हें वहां से हटाने का दावा करने वाले भी अपने घरों में सोये रहते हैं । जानवरों की तरह रेंगने वाले हम तथाकथित इंसान यातायात के नियमों की परवाह किए बगैर दौड़ने लगते हैं और उनमें से बहुत से लोग हमेशा के लिए सो जाते हैं । चिट्ठी वाले समारोह हो जाने के बाद चिट्ठी पहुंचाते हैं, गुस्सा डाकिए पर निकाला जाए या निमंत्रण मन से न भेजने वालों पर । बधाई की चिट्ठी देर से आई हो मगर बख़्शीश तो आपको देनी ही पड़ेगी । हवाई जहाज वाले भी आठ-आठ घंटे लेट हो जाते हैं, पूछने पर पता चलता है कि हवाई यात्रा के लिए बिना पासपोर्ट एक मूषक प्रवेश कर गया था और उसे वहां से भगाने के लिए न जाने कितनी बिल्लियों को बुलाना पड़ा थ । किसी मजदूर-मिस्त्री का आप इंतजार कर रहे हैं तो पता चलता है कि देर रात तक फिल्मक देखने के कारण देर तक सोया रहा, वैसे भी आपको तो पता ही नहीं है कि आजकल कौन सी फिल्म हिट है, क्योंकि आप तो टी वी पर बिजनेस समाचार देखते रहते हैं या फिर नेताओं की करतूतों को ।
उस दिन मैंने अपने सहयोगी चितलकर से इस बारे में बात करनी चाही तो वो बोला, ‘हां यार, सोने का भाव तो लगातार बढ़ता ही जा रहा है जैसे पानी के पाईप में एक छोटा सा छेद बढ़ता ही जाता है ।‘ फिर वह शेयर मार्केट के गिरने की बात करने लगा, मंदी की मार की बात करने लगा । मुझे डर लगा कि वह कहीं सत्यम कंपनी का ऑडिट करने वालों की तरह सो जाएगा, मैंने उसे टोका और समझाने की कोशिश कि मैं स्वर्ण-मुद्रा या किसी स्वर्ण-युग की बात नहीं कर रहा हूं, मैं तो नींद की बात कर रहा हूं तो अचानक उसे नींद आने लगी और अपने खुले मुंह के आगे चुटकी बजाते हुए उसने फरमाईश कर दी, ‘अरे यार, नींद आ रही है, बहुत दिन हो गए तुमने चाय नहीं पिलाई, अब चाय-कॉफी मंगाओ और हां साथ में पाव वगैरह भी मंगवाना, वो क्या है कि बिना कुछ खाए-पिए तुम्हा री बात हज़म नहीं होती है ।‘
अभी कल की ही तो बात है कि जब मैं बस से दफ़्तर जा रहा था तो अचानक एक यात्री चिल्ला ने लगा कि उसके बैग कोई लेकर भाग गया, उसमें सात हजार रूपए थे, सभी लोग उस घटना का पोस्टामार्टम करने लगे । तुम सो रहे थे क्याथ ? अच्छा बताओ, बैग किस रंग का था? क्याट तुम घर से लेकर चले थे ? कहीं ऐसा तो नहीं कि वह घर पर ही रह गया हो ? जरा मोबाइल से घर पर पहले पूछ लो ? जवाब मिलता है कि घर पर तो बुजुर्ग पिताजी हैं और अभी तो वो सो रहे होंगे । अच्छा बताओ, बैग में और क्या था ? अरे वो रुपए निकाल कर ले गया होगा बाकी सामान कहीं कूड़े के ढेर पर फेंक गया होगा । एक बार मेरे साथ भी ऐसा हो गया था, अब नहीं मिलने थे, नहीं मिले, उसकी किस्मत! ऐसी घटनाएं अक्सर हो जाती हैं और लोग तरह-तरह की बातें मिर्च-मसाला लगाकर करते हैं, कोई उन्हें यह सलाह नहीं देता कि पुलिस में रिपोर्ट लिखवाओ, मेरे जैसा सलाह देता भी है तो सुनता कौन है, जवाब मिलता है कि पुलिस वाले क्या करेंगे, सब सोये रहते हैं । उनसे पूछा जाए कि अगर तुम्हें सब कुछ मालूम है तो शिकायत कीजिए, लेकिन वो इस तरह से देखते हैं जैसे किसी पागल ने गहरी नींद में समझदारी की बात कर दी हो ।
उधर प्रेमी शिकायत कर रहा है कि कल रात तुम्हारे ख़्वाबों ने सोने नहीं दिया, तुम तो हमेशा की तरह नर्म बिस्तर पर टैडी बेयर के साथ सो गई लेकिन मैं अपनी बालकनी में खड़े होकर तारे गिनता रहा । प्रेमिका ने जवाब दिया, ‘तुम बालकनी में खड़े हो, यह मुझे मालूम था लेकिन बापू सो रहे थे, कहीं आहट से जाग जाते तो और तुम्हें पता है, बाद में मैं अंधेरे में हिम्मत करके नींद में से उठी लेकिन बिस्तर से ही नीचे गिर गई और देखो, मुझे इस टैडी बेयर ने बचा लिया क्योंकि यह मेरे हाथ में था, वरना आज मैं तुमसे चोट के कारण मिल ही नहीं पाती । ‘इट इज माई लक्कीह चार्म’ और यह कहते हुए उसने टैडी-बेयर को चूम लिया ।
पूरे साल पढ़ाने वाले और पढ़ने वाले दोनों सोये रहते हैं, सिलेबस हर महीने बदल जाता है, किताबें समय पर छपती नहीं है, कभी सर्दी की और कभी तेज गर्मी के कारण छुट्टियां हो जाती हैं, त्योहारों के कारण लेडी टीचर्स एक दूसरे को व्यंजन बनाना सिखाती हैं, सोने के गहनों की डिजाईन के बारे में जानकारी देती हैं और आधुनिक युग के बिगड़ते बच्चों की शिकायतें करती हैं । उधर पुरुष अध्यापक तो अपने घर का गुस्साब बच्चों पर निकालते हैं और महिलाओं को आयकर में दी जाने वाली अधिक छूट का, उनको काम के आबंटन में दी जा रही सुविधाओं का रोना भी रोते हैं । हमारे बच्चों की तो क्या कहें, उनमें पहले कॉमिक्स पढ़ने की बीमारी थी तो अब डोरमोन, परमैन के कारनामे देखने की ललक जाग गई है, वो तो समय रहते किसी की आंख खुल गई और शिनचैन पर पाबंदी लग गई, नहीं तो हाय तौबा, पांच साल का बच्चा पता नहीं क्या-क्या गुल खिला रहा था । क्या कहा पाबंदी वापस हट गई, कोई बात नहीं, वापस लगा देंगे, अब तो कंप्यूटर पर नये गेम भी तो लाखों की संख्या में आ गए हैं । होम-वर्क के लिए ट्यूटर, कोचिंग सेंटर और मां-बाप तो हैं ही, उसकी चिंता कौन करे ।
एफ एम और टी वी वाले दुष्प्रचार कर रहे हैं, मगर दर्शक और श्रोतागण सोये हुए हैं । विज्ञापनों की भरमार में प्रत्येक अभिनेता और खिलाड़ी हमें फलां साबुन-शैम्पू प्रयोग करने की सलाह दे रहा है । ऐसा लगा कि वह जाग रहे हैं और हमें जगाने की कोशिश कर रहे हैं, पता करने पर पता चला कि कंपनी से मोटी रकम ऐंठ कर कई दिनों से बिना दांत साफ किए और बिना नहाए सो रहे हैं । दस दिन में दस किलो वजन कम करने का शर्तिया दावा और पंद्रह दिन में कमरे को वापस कमर बनाने वाले उपचारों का प्रचार लगातार हो रहा है और हम हैं कि अपने क्रेडिट कार्ड का वजन बढ़ा रहे हैं, मोबाइल का बिल बढ़ा रहे हैं और दिमाग में चिंताओं का घर बना रहे हैं । हमारे समाचार चैनलों वाले टीआरपी बढ़ाने की कोशिश में तो जागते हैं लेकिन एक ही समाचार को पच्चीस टुकड़ों में बांटकर और रावण की तरह चिल्ला-चिल्लाकर बोलते हुए बार-बार उसको दिखाकर जागे हुए लोगों को भी सुला देते हैं । उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि किस दृश्य का किस पर कितना प्रभाव पड़ेगा । लगता है कि अपने दायित्वों की और प्रसारण संबंधी नियमावली को पढ़ते-पढ़ते वे सो गए थे ।
मंदी की मार में दुकानदार ग्राहकों के इंतजार में सोये हुए हैं । महंगाई का ग्राफ इस तरह से ऊपर-नीचे हो रहा है जैसे छोटे-बच्चे सांप-सीढ़ी का खेल खेल रहे हैं । एक बार चुनाव जीत जाने के बाद अगले चुनाव की प्रतीक्षा में पार्षद साहब सो रहे हैं । देश में हड़तालें हो रही हैं, आंदोलन हो रहे हैं, दुर्घटनाएं हो रही हैं, चोरियां हो रही हैं, घोटाले हो रहे हैं, छोटे-छोटे गुट अत्याचार फैला रहे हैं, मगर देश को विकास की ओर ले जाने वाले जिम्मेदार लोग सोये हुए हैं । आतंकवाद फैल रहा है मगर तथाकथित चौकीदार सोये हुए हैं । हथियारों की तस्करी हो रही है, नकली नोटों का बाजार गर्म है, मगर सीमा पर तैनाती सोये हुए हैं । पड़ोसी देश हमारी सोयी हुई व्यवस्था का लाभ उठाकर रोज बयानबाजी बदल रहे हैं लेकिन हम उन्हें छोटी सी मक्खी मानकर अपनी नाक से उड़ा रहे हैं ताकि हमारी नींद में खलल पैदा न हो ।
मैं अक्सयर सोचता हूं कि सब सोए क्यों रहते हैं, फिर मुझे लगता है कि मैं तो जाग ही रहा हूं, कुछ और लोग भी जाग रहे होंगे, यदि सब लोग एक साथ जाग जाएं तब तो क्रांति ही आ जाएगी और अभी शायद हमारे देश को क्रांति की आवश्य कता नहीं है क्योंकि अभी तो आजाद हुए हमें एक शताब्दी भी नहीं हुई है । वैसे भी अभी मेरी उम्र ही क्यां है, जब अस्सीं-नब्बे साल के लोग प्रधानमंत्री और मुख्यंमंत्री पद के लिए लोलुपता दर्शा रहे हैं तो भला मैं अपना घर देखूं या देश की चिंता करुं । अभी तो रात के तीसरे प्रहर की वेला में मेरे जैसे जीवन के अर्द्ध-शतक लगाने के आस-पास डोल रहे लोगों को क्रांति नहीं शांति चाहिए, जब सब जाग जाएं तो मुझे भी उठा देना और वैसे भी सागर में से एक बूंद निकल भी जाए तो भला सागर को क्या फर्क पड़ता है ।
मैं एक बार फिर से सोने का उपक्रम करता हूं ।
यह नींद भी अजीब बीमारी है, किसी को आती नहीं है तो किसी को बहुत आती है । अक्स़र सोचता हूं कि श्रीनारायण अगर सामने आएं तो मैं उनसे यह वरदान मांग लूं कि मेरी आंखों से नींद उड़ा दो, दीवार जो हम दोनों में है आज गिरा दो, जिस तरह कुंभकरण को सोते रहने का वरदान दिया था, उसी तरह मुझे जागते रहने का वरदान दे दो । लेकिन वो शायद कुछ अधिक समझदार हैं, मेरी बात पहले से ही सुन लेते हैं और संभल जाते हैं, इसी कारण तो वो मेरे सामने कभी आते नहीं है । मुझे ऐसा लगता है कि वो भी लकीर के फ़कीर बने रहना चाहते हैं और कोई नया काम करने को तैयार नहीं है या यूं कहें कि भगवान भी सोया रहना चाहता है ।
वैसे भी हमारे देश में सोने का प्रचलन कुछ ज्यादा ही है । मौसम विभाग सोया हुआ रहता है, जिस दिन कहता है कि बारिश आएगी, तेज गर्मी पड़ती है, जिस दिन लू चलने की बात करता है कि कहीं से कोई बदली आकर बरस जाती है । बागों के माली सोये हुए रहते हैं, इसलिए वहां पर क्यारियों में कूड़े के ढेर मिलते हैं, गंदगी के साम्राज्य को देखते हुए फूलों की खुशबू तो वहां से कपूर की तरह काफ़ूर हो गई है । रेलवे स्टेढशन पर सवारियां गाड़ी की प्रतीक्षा में ऊंघती रहती हैं और गाड़ी आ जाने पर उसके अंदर सोने के लिए जगह ढूंढती रहती हैं । अपनी बर्थ पक्कीऔ करने के लिए न जाने कितने दिन पहले टिकट लेनी पड़ती है, नहीं मिलती तो एजेंट हैं ना । सड़को के बीच में गाय रंभाती रहती हैं, कुत्ते सोये रहते हैं और उन्हें वहां से हटाने का दावा करने वाले भी अपने घरों में सोये रहते हैं । जानवरों की तरह रेंगने वाले हम तथाकथित इंसान यातायात के नियमों की परवाह किए बगैर दौड़ने लगते हैं और उनमें से बहुत से लोग हमेशा के लिए सो जाते हैं । चिट्ठी वाले समारोह हो जाने के बाद चिट्ठी पहुंचाते हैं, गुस्सा डाकिए पर निकाला जाए या निमंत्रण मन से न भेजने वालों पर । बधाई की चिट्ठी देर से आई हो मगर बख़्शीश तो आपको देनी ही पड़ेगी । हवाई जहाज वाले भी आठ-आठ घंटे लेट हो जाते हैं, पूछने पर पता चलता है कि हवाई यात्रा के लिए बिना पासपोर्ट एक मूषक प्रवेश कर गया था और उसे वहां से भगाने के लिए न जाने कितनी बिल्लियों को बुलाना पड़ा थ । किसी मजदूर-मिस्त्री का आप इंतजार कर रहे हैं तो पता चलता है कि देर रात तक फिल्मक देखने के कारण देर तक सोया रहा, वैसे भी आपको तो पता ही नहीं है कि आजकल कौन सी फिल्म हिट है, क्योंकि आप तो टी वी पर बिजनेस समाचार देखते रहते हैं या फिर नेताओं की करतूतों को ।
उस दिन मैंने अपने सहयोगी चितलकर से इस बारे में बात करनी चाही तो वो बोला, ‘हां यार, सोने का भाव तो लगातार बढ़ता ही जा रहा है जैसे पानी के पाईप में एक छोटा सा छेद बढ़ता ही जाता है ।‘ फिर वह शेयर मार्केट के गिरने की बात करने लगा, मंदी की मार की बात करने लगा । मुझे डर लगा कि वह कहीं सत्यम कंपनी का ऑडिट करने वालों की तरह सो जाएगा, मैंने उसे टोका और समझाने की कोशिश कि मैं स्वर्ण-मुद्रा या किसी स्वर्ण-युग की बात नहीं कर रहा हूं, मैं तो नींद की बात कर रहा हूं तो अचानक उसे नींद आने लगी और अपने खुले मुंह के आगे चुटकी बजाते हुए उसने फरमाईश कर दी, ‘अरे यार, नींद आ रही है, बहुत दिन हो गए तुमने चाय नहीं पिलाई, अब चाय-कॉफी मंगाओ और हां साथ में पाव वगैरह भी मंगवाना, वो क्या है कि बिना कुछ खाए-पिए तुम्हा री बात हज़म नहीं होती है ।‘
अभी कल की ही तो बात है कि जब मैं बस से दफ़्तर जा रहा था तो अचानक एक यात्री चिल्ला ने लगा कि उसके बैग कोई लेकर भाग गया, उसमें सात हजार रूपए थे, सभी लोग उस घटना का पोस्टामार्टम करने लगे । तुम सो रहे थे क्याथ ? अच्छा बताओ, बैग किस रंग का था? क्याट तुम घर से लेकर चले थे ? कहीं ऐसा तो नहीं कि वह घर पर ही रह गया हो ? जरा मोबाइल से घर पर पहले पूछ लो ? जवाब मिलता है कि घर पर तो बुजुर्ग पिताजी हैं और अभी तो वो सो रहे होंगे । अच्छा बताओ, बैग में और क्या था ? अरे वो रुपए निकाल कर ले गया होगा बाकी सामान कहीं कूड़े के ढेर पर फेंक गया होगा । एक बार मेरे साथ भी ऐसा हो गया था, अब नहीं मिलने थे, नहीं मिले, उसकी किस्मत! ऐसी घटनाएं अक्सर हो जाती हैं और लोग तरह-तरह की बातें मिर्च-मसाला लगाकर करते हैं, कोई उन्हें यह सलाह नहीं देता कि पुलिस में रिपोर्ट लिखवाओ, मेरे जैसा सलाह देता भी है तो सुनता कौन है, जवाब मिलता है कि पुलिस वाले क्या करेंगे, सब सोये रहते हैं । उनसे पूछा जाए कि अगर तुम्हें सब कुछ मालूम है तो शिकायत कीजिए, लेकिन वो इस तरह से देखते हैं जैसे किसी पागल ने गहरी नींद में समझदारी की बात कर दी हो ।
उधर प्रेमी शिकायत कर रहा है कि कल रात तुम्हारे ख़्वाबों ने सोने नहीं दिया, तुम तो हमेशा की तरह नर्म बिस्तर पर टैडी बेयर के साथ सो गई लेकिन मैं अपनी बालकनी में खड़े होकर तारे गिनता रहा । प्रेमिका ने जवाब दिया, ‘तुम बालकनी में खड़े हो, यह मुझे मालूम था लेकिन बापू सो रहे थे, कहीं आहट से जाग जाते तो और तुम्हें पता है, बाद में मैं अंधेरे में हिम्मत करके नींद में से उठी लेकिन बिस्तर से ही नीचे गिर गई और देखो, मुझे इस टैडी बेयर ने बचा लिया क्योंकि यह मेरे हाथ में था, वरना आज मैं तुमसे चोट के कारण मिल ही नहीं पाती । ‘इट इज माई लक्कीह चार्म’ और यह कहते हुए उसने टैडी-बेयर को चूम लिया ।
पूरे साल पढ़ाने वाले और पढ़ने वाले दोनों सोये रहते हैं, सिलेबस हर महीने बदल जाता है, किताबें समय पर छपती नहीं है, कभी सर्दी की और कभी तेज गर्मी के कारण छुट्टियां हो जाती हैं, त्योहारों के कारण लेडी टीचर्स एक दूसरे को व्यंजन बनाना सिखाती हैं, सोने के गहनों की डिजाईन के बारे में जानकारी देती हैं और आधुनिक युग के बिगड़ते बच्चों की शिकायतें करती हैं । उधर पुरुष अध्यापक तो अपने घर का गुस्साब बच्चों पर निकालते हैं और महिलाओं को आयकर में दी जाने वाली अधिक छूट का, उनको काम के आबंटन में दी जा रही सुविधाओं का रोना भी रोते हैं । हमारे बच्चों की तो क्या कहें, उनमें पहले कॉमिक्स पढ़ने की बीमारी थी तो अब डोरमोन, परमैन के कारनामे देखने की ललक जाग गई है, वो तो समय रहते किसी की आंख खुल गई और शिनचैन पर पाबंदी लग गई, नहीं तो हाय तौबा, पांच साल का बच्चा पता नहीं क्या-क्या गुल खिला रहा था । क्या कहा पाबंदी वापस हट गई, कोई बात नहीं, वापस लगा देंगे, अब तो कंप्यूटर पर नये गेम भी तो लाखों की संख्या में आ गए हैं । होम-वर्क के लिए ट्यूटर, कोचिंग सेंटर और मां-बाप तो हैं ही, उसकी चिंता कौन करे ।
एफ एम और टी वी वाले दुष्प्रचार कर रहे हैं, मगर दर्शक और श्रोतागण सोये हुए हैं । विज्ञापनों की भरमार में प्रत्येक अभिनेता और खिलाड़ी हमें फलां साबुन-शैम्पू प्रयोग करने की सलाह दे रहा है । ऐसा लगा कि वह जाग रहे हैं और हमें जगाने की कोशिश कर रहे हैं, पता करने पर पता चला कि कंपनी से मोटी रकम ऐंठ कर कई दिनों से बिना दांत साफ किए और बिना नहाए सो रहे हैं । दस दिन में दस किलो वजन कम करने का शर्तिया दावा और पंद्रह दिन में कमरे को वापस कमर बनाने वाले उपचारों का प्रचार लगातार हो रहा है और हम हैं कि अपने क्रेडिट कार्ड का वजन बढ़ा रहे हैं, मोबाइल का बिल बढ़ा रहे हैं और दिमाग में चिंताओं का घर बना रहे हैं । हमारे समाचार चैनलों वाले टीआरपी बढ़ाने की कोशिश में तो जागते हैं लेकिन एक ही समाचार को पच्चीस टुकड़ों में बांटकर और रावण की तरह चिल्ला-चिल्लाकर बोलते हुए बार-बार उसको दिखाकर जागे हुए लोगों को भी सुला देते हैं । उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि किस दृश्य का किस पर कितना प्रभाव पड़ेगा । लगता है कि अपने दायित्वों की और प्रसारण संबंधी नियमावली को पढ़ते-पढ़ते वे सो गए थे ।
मंदी की मार में दुकानदार ग्राहकों के इंतजार में सोये हुए हैं । महंगाई का ग्राफ इस तरह से ऊपर-नीचे हो रहा है जैसे छोटे-बच्चे सांप-सीढ़ी का खेल खेल रहे हैं । एक बार चुनाव जीत जाने के बाद अगले चुनाव की प्रतीक्षा में पार्षद साहब सो रहे हैं । देश में हड़तालें हो रही हैं, आंदोलन हो रहे हैं, दुर्घटनाएं हो रही हैं, चोरियां हो रही हैं, घोटाले हो रहे हैं, छोटे-छोटे गुट अत्याचार फैला रहे हैं, मगर देश को विकास की ओर ले जाने वाले जिम्मेदार लोग सोये हुए हैं । आतंकवाद फैल रहा है मगर तथाकथित चौकीदार सोये हुए हैं । हथियारों की तस्करी हो रही है, नकली नोटों का बाजार गर्म है, मगर सीमा पर तैनाती सोये हुए हैं । पड़ोसी देश हमारी सोयी हुई व्यवस्था का लाभ उठाकर रोज बयानबाजी बदल रहे हैं लेकिन हम उन्हें छोटी सी मक्खी मानकर अपनी नाक से उड़ा रहे हैं ताकि हमारी नींद में खलल पैदा न हो ।
मैं अक्सयर सोचता हूं कि सब सोए क्यों रहते हैं, फिर मुझे लगता है कि मैं तो जाग ही रहा हूं, कुछ और लोग भी जाग रहे होंगे, यदि सब लोग एक साथ जाग जाएं तब तो क्रांति ही आ जाएगी और अभी शायद हमारे देश को क्रांति की आवश्य कता नहीं है क्योंकि अभी तो आजाद हुए हमें एक शताब्दी भी नहीं हुई है । वैसे भी अभी मेरी उम्र ही क्यां है, जब अस्सीं-नब्बे साल के लोग प्रधानमंत्री और मुख्यंमंत्री पद के लिए लोलुपता दर्शा रहे हैं तो भला मैं अपना घर देखूं या देश की चिंता करुं । अभी तो रात के तीसरे प्रहर की वेला में मेरे जैसे जीवन के अर्द्ध-शतक लगाने के आस-पास डोल रहे लोगों को क्रांति नहीं शांति चाहिए, जब सब जाग जाएं तो मुझे भी उठा देना और वैसे भी सागर में से एक बूंद निकल भी जाए तो भला सागर को क्या फर्क पड़ता है ।
मैं एक बार फिर से सोने का उपक्रम करता हूं ।
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